महासमुंद(जीतयादव)। साइबर ठगी और ‘म्यूल बैंक खातों’ के जरिए करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन के मामले में महासमुंद की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश आनंद बोरकर की अदालत ने सात आरोपियों को दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है, जबकि एक आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
म्यूल बैंक खातों से करोड़ों के संदिग्ध ट्रांजेक्शन मामले में साइबर ठगी के सात दोषी करार।
मामला भारत सरकार के गृह मंत्रालय के समन्वय पोर्टल से मिली सूचना के बाद सामने आया था। पोर्टल के माध्यम से महासमुंद पुलिस को साइबर ठगी में उपयोग किए जा रहे संदिग्ध बैंक खातों की जानकारी मिली, जिसके आधार पर थाना महासमुंद में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की गई। तत्कालीन थाना प्रभारी निरीक्षक शरद दुबे की जांच में सामने आया कि आरोपियों ने विभिन्न बैंकों में अपने नाम से खाते खुलवाकर उनका उपयोग साइबर ठगी से प्राप्त रकम के अवैध लेन-देन के लिए किया।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, कोटक महिंद्रा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और आईडीबीआई बैंक में संचालित खातों से 95 लाख रुपये, 24 लाख रुपये और 1.60 करोड़ रुपये तक के संदिग्ध ट्रांजेक्शन किए गए। अदालत में बैंक स्टेटमेंट और बैंक अधिकारियों की गवाही के आधार पर इन लेन-देन की पुष्टि हुई, जबकि आरोपी इन पैसों का कोई वैध स्रोत या स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सके।
न्यायालय ने रविंदर सिंह चावला, महेश जैस उर्फ महेश साहू, राज चंद्राकर, शीतल कुमार साहू, रामनारायण साहू, प्रीतम उर्फ प्रेम मारकण्डे और नौशाद साहू को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 317(2) एवं 61(2) के तहत दोषी करार दिया। सभी को धारा 317(2) के तहत तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 100-100 रुपये अर्थदंड तथा धारा 61(2) के तहत एक-एक वर्ष के सश्रम कारावास एवं 100-100 रुपये अतिरिक्त अर्थदंड की सजा सुनाई गई। न्यायालय ने सभी सजाएं साथ-साथ चलाने का आदेश दिया है।
वहीं, आरोपी दीपक तिलवानी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं होने पर अदालत ने उसे संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने माना कि उसके विरुद्ध बैंक खाते अथवा अवैध वित्तीय लेन-देन में संलिप्तता के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं थे।


