महासमुंद। विकसित भारत 2047 के विज़न को लेकर समाज में जागरूकता और विचार-विमर्श लगातार बढ़ रहा है। इसी कड़ी में ऋचा चंद्राकर ‘तत्वाकांक्षी’ (महासमुंद) ने एक विचारपूर्ण लेख के माध्यम से विकसित भारत की अवधारणा को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि भारत को अमेरिका, यूरोप या जापान जैसा नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, परंपरा और मूल्यों के अनुरूप विकसित बनाना होगा।
युवाओं की भूमिका अहम, आत्मनिर्भरता और एकता से ही बनेगा विकसित भारत।
लेख में बताया गया है कि किसी भी देश के विकास का आकलन उसकी आर्थिक स्थिति, खुशहाली और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी स्थिति से किया जाता है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर मजबूत होना आवश्यक है। साथ ही विकास योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है।
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लेख में युवाओं की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बताया गया है। यह वर्तमान समय को “युवाओं का स्वर्णिम काल” बताते हुए कहा गया है कि देश की प्रगति में युवाओं की ऊर्जा और सोच निर्णायक साबित होगी। उन्होंने आह्वान किया कि धर्म, जाति और भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना होगा।
लेख में यह भी कहा गया है कि भारत के पास संसाधनों और अवसरों की कोई कमी नहीं है, बल्कि जरूरत है हर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने, कौशल विकसित करने और उनकी आय को मजबूत करने की। शिक्षा, स्वास्थ्य और विज्ञान के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही विकसित भारत की पहचान बनेगी।
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ऋचा चंद्राकर ने अपने लेख में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब तक देश खुद पर विश्वास नहीं करेगा, तब तक विकास संभव नहीं है। उन्होंने युवाओं में आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जगाने पर जोर दिया।
अंत में उन्होंने संदेश दिया कि यदि हम सभी मिलकर कार्य करें, तो 2047 तक भारत एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र बन सकता है।



