बसना।बसना नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षण-प्रशिक्षण विषय पर एकदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य विकास वर्ग में मां भारती के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया गया। इस प्रशिक्षण में 54 आचार्य एवं दीदियों ने सहभागिता कर प्रशिक्षण का लाभ लिया।
सरस्वती शिशु मंदिर बसना में एकदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित
प्रशिक्षण सत्र में वरिष्ठ आचार्य श्री अभिमन्यु दास ने ब्रह्मनाद करने की विधि को विस्तार से समझाते हुए बताया कि प्रथम नाद को 75 प्रतिशत से 25 प्रतिशत, द्वितीय नाद को 50 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तथा तृतीय नाद को 25 प्रतिशत से 75 प्रतिशत अनुपात में किया जाता है। साथ ही उन्होंने गायत्री मंत्र के शुद्ध एवं सही उच्चारण की विधि भी सिखाई।

इस अवसर पर सरस्वती शिशु मंदिर के प्राचार्य श्री रमेश कुमार कर ने अपने उद्बोधन में कहा कि मनुष्य जीवन की अंतिम सांस तक सीखता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति में सोचने-विचारने की क्षमता अलग-अलग होती है। सभी को संतुष्ट करने एवं विद्यालय को सही दिशा देने के लिए विद्या भारती की योजनाओं को समझना आवश्यक है। आत्मविश्वास बढ़ाने और व्यक्तित्व विकास के लिए निरंतर प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।

प्रशिक्षण के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं ने कहा कि विद्यालय संचालन हेतु बनाई गई योजनाओं का पूर्ण मनोयोग एवं निष्ठा से पालन करना आवश्यक है। उन्होंने डॉ. बलिराम हेडगेवार के विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने समाज को एकजुट कर एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। बार-बार की गुलामी से त्रस्त भारत माता को मुक्त कराने के लिए उन्होंने लोगों को संगठित किया।“त्याग के समान सुख नहीं, संग्रह के समान दुःख नहीं, ज्ञान के समान तप नहीं” — इस शास्त्रीय वाक्य को डॉ. हेडगेवार ने अपने जीवन में उतारकर समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया।

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि कला को साधने के लिए मन को साधना आवश्यक है। शब्दों की गरिमा का सही चयन होना चाहिए तथा योजकता का गुण विकसित करने के लिए स्वयं का निरंतर मूल्यांकन करना पड़ता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षण-प्रशिक्षण विषय पर अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री मुकुल कानिटकर के यूट्यूब माध्यम से अमृतवाणी के द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को बार-बार दोहराना ही कौशल कहलाता है। कला को साधना, उसका प्रकटीकरण करना आवश्यक है। मनुष्य के अंतर्मन में निहित सुप्त कला और ज्ञान को प्रकट करना ही वास्तविक शिक्षा है।कार्यक्रम का समापन सकारात्मक वातावरण में हुआ, जिसमें उपस्थित सभी आचार्य-दीदियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षण में आत्मसात करने का संकल्प लिया।




